• रम्भा:
    गेहे गेहे जङ्गमा हेमवल्ली
    वल्यां वल्यां पार्वणं चन्द्रबिम्बम् ।
    बिम्बे बिम्बे दृश्यते मीन युग्मं
    युग्मे युग्मे पञ्चबाणप्रचारः ॥

    हे मुनिवर ! हर घर में घूमती फिरती सोने की लता जैसी ललनाओं के मुख पूर्णिमा के चंद्र जैसे सुंदर हैं । उन मुखचंद्रो में नयनरुप दो मछलीयाँ दिख रही है, और उन मीनरुप नयनों में कामदेव स्वतंत्र घूम रहा है ।

  • तीर्थे तीर्थे निर्मलं ब्रह्मवृन्दं
    वृन्दे वृन्दे तत्त्व चिन्तानुवादः ।
    वादे वादे जायते तत्त्वबोधो
    बोधे बोधे भासते चन्द्रचूडः ॥

    हर तीर्थ में पवित्र ब्राह्मणों का समुदाय विराजमान है । उस समुदाय में तत्त्व का विचार हुआ करता है । उन विचारों में तत्त्व का ज्ञान होता है, और उस ज्ञान में भगवान चंद्रशेखर शिवजी का भास होता है ।

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  • रम्भा:
    मार्गे मार्गे नूतनं चूतखण्डं
    खण्डे खण्डे कोकिलानां विरावः ।
    रावे रावे मानिनीमानभंगो
    भंगे भंगे मन्मथः पञ्चबाणः ॥

    हे मुनि ! हर मार्ग में नयी मंजरी शोभायमान हैं, हर मंजरी पर कोयल सुमधुर टेहुक रही हैं । टेहका सुनकर मानिनी स्त्रीयों का गर्व दूर होता है, और गर्व नष्ट होते हि पाँच बाणों को धारण करनेवाले कामदेव मन को बेचेन बनाते हैं ।